पाँच साल पहले मैंने एक फ़ैसला किया था, जिसने हमेशा के लिए मेरा जीवन बदल दिया था. मैंने बॉलीवुड में क़दम रखा और इससे मेरे लिए अपार लोकप्रियता के दरवाज़े खुले. मैं जनता के ध्यान का केंद्र बनने लगी. मुझे क़ामयाबी की मिसाल के तौर पर तरह पेश किया गया और अक्सर युवाओं के लिए रोल मॉडल बताया जाने लगा.

हालांकि मैं कभी ऐसा नहीं करना चाहती थी और न ही ऐसा बनना चाहती थी. ख़ासकर क़ामयाबी और नाकामी को लेकर मेरे विचार ऐसे नहीं थे और इस बारे में तो मैंने अभी सोचना-समझना शुरू ही किया था.

आज जब मैंने बॉलीवुड में पांच साल पूरे कर लिए हैं तब मैं ये बात स्वीकार करना चाहती हूं कि इस पहचान से यानी अपने काम को लेकर खुश नहीं हूं. लंबे समय से मैं ये महसूस कर रही हूं कि मैंने कुछ और बनने के लिए संघर्ष किया है.

मैंने अब उन चीज़ों को खोजना और समझना शुरू किया है जिन चीज़ों के लिए मैंने अपना समय, प्रयास और भावनाएं समर्पित की हैं. इस नए लाइफ़स्टाइल को समझा तो मुझे अहसास हुआ कि भले ही मैं यहां पूरी तरह से शायद फिट बैठ सकती हूं, लेकिन मैं यहां के लिए नहीं बनीं हूं.

इस क्षेत्र ने मुझे बहुत प्यार, सहयोग और तारीफ़ें दी हैं लेकिन ये मुझे गुमराही के रास्ते पर भी ले आया है. मैं ख़ामोशी से और अनजाने में अपने ईमान से बाहर निकल आई.

मैंने ऐसे माहौल में काम करना जारी रखा जिसने लगातार मेरे ईमान में दख़लअंदाज़ी की. मेरे धर्म के साथ मेरा रिश्ता ख़तरे में आ गया. मैं नज़रअंदाज़ करके आगे बढ़ती रही और अपने आप को आश्वस्त करती रही कि जो मैं कर रही हूं सही है और इसका मुझ पर फ़र्क॰ नहीं पड़ रहा है. मैंने अपने जीवन से सारी बरकतें खो दीं.

बरकत ऐसा शब्द है जिसके मायने सिर्फ॰ ख़ुशी या आशीर्वाद या संघ्यात्मक वृद्धी तक ही सीमित नहीं है बल्कि ये स्थिरता (दृढता) के विचार पर भी केंद्रित है और मैं इसे लेकर संघर्ष करती रही हूं.

मैं लगातार संघर्ष कर रही थी कि मेरी आत्मा मेरे विचारों और स्वाभाविक समझ से मिलाप कर ले और मैं अपने ईमान की स्थिर तस्वीर बना लूं. लेकिन मैं इसमें बुरी तरह नाकाम रही. कोई एक बार नहीं बल्कि सैकड़ों बार.

अपने फ़ैसले को मज़बूत करने के लिए मैंने जितनी भी कोशिशें कीं, उनके बावजूद मैं वही बनी रही जो मैं हूं और हमेशा अपने आप से ये कहती रही कि जल्द ख़ुद को बदल लूंगी.

मैं लगातार टालती रही और अपनी आत्मा को इस विचार में फंसाकर छलती रही कि मैं जानती हूं कि जो मैं कर रही हूं वो सही नहीं नहीं लग रहा. लेकिन एक दिन जब सही समय आएगा तो मैं इस पर रोक लगा दूंगी. ऐसा करके मैं लगातार ख़ुद को कमज़ोर स्थिति में रखती, जहां मेरी शांति, मेरे ईमान और अल्लाह के साथ मेरे रिश्ते को नुक़सान पहुंचानेवाले माहौल का शिकार बनना आसान था.

मैं चीज़ों को देखती रही और अपनी धारणाओं को ऐसे बदलते रही जैसे मैं चाहती थी. बिना ये समझे कि मूल बात ये है कि उन्हें ऐसे ही देखा जाए जैसी कि वो हैं.

मैं बचकर भागने की कोशिशें करती और आखिरकार बंद रास्ते पर पहुंच जाती. इस अंतहीन सिलसिले में कुछ था जो मैं खो रही थी और जो लगातार मुझे प्रताडित कर रहा था, जिसे न मैं समझ पा रही थी और न ही संतुष्ट हो पा रही थी.

यह तब तक चला जब तक मैंने अपने दिल को अल्लाह के शब्दों से (कुरआन से) जोड़कर अपनी कमज़ोरियों से लड़ने और अपनी अज्ञानता को सही करने का फ़ैसला नहीं किया.

क़ुरान के महान और आलौकिक ज्ञान में मुझे शांति और संतोष मिला. वास्तव में दिल को सुकून तब ही मिलता है जब इंसान अपने ख़ालिक़ (निर्माता) के बारे में, उसके गुणों, उसकी दया और उसके आदेशों के बारे में जानता है.

मैंने अपनी स्वयं घडी हुई धारणाओं को महत्व देने के बजाय अपनी सहायता और मार्गदर्शन के लिए अल्लाह की दया पर और अधिक भरोसा करना शुरू कर किया.

मेरे धर्म के मूल सिद्धांतों के बारे में मेरा कम ज्ञान और दुनियावी (लौकिक जगत) से संबंधित मेरी इच्छा-लालच के प्रभाव के चलते पहेले अपने में बदलाव लाने की मेरी असमर्थता का मुझे अहेसास हुवा। दरअसल दिली सुकून और ख़ुशी की जगह अपनी (दुनियावी और खोखली) इच्छाओं को बढ़ाने और संतुष्ट करने का नतीजा थी.

मेरा दिल शक़ और ग़लती करने की जिस बीमारी से पीड॰ित था उसे मैंने पहचान लिया था. हमारे दिल पर दो बीमारियां हमला करती हैं. ‘संदेह और ग़लतियां’ और दूसरी ‘हवस और कामनाएं.’ इन दोनों का ही क़ुरान में उल्लेख है –

अल्लाह कहता है –

‘उनके दिलों में एक बीमारी है (संदेह और पाखंड की) जिसे मैंने (उनके इस अपराध की स़जा के तौरपर) और ़ज्यादा बढ़ा दिया है.’
– (़कुरआन – २:१०)

मुझे अहसास हुआ कि इसका इलाज सिर्फ अल्लाह की शरण में जाने सेही होगा और वास्तव में जब मैं रास्ता भटक गई थी तब अल्लाहही ने मुझे राह दिखाई.

क़ुरान और अल्लाह के संदेष्टा (मुहम्मद सलअम् ) का मार्गदर्शन मेरे फ़ैसले लेने और तर्क करने की वजह बना और इसने जिंदगी के प्रति मेरे नज़रिये और िंजंदगी के मायने को बदल दिया.

हमारी इच्छाएं हमारी नैतिकता का प्रतिबिंब हैं. हमारे मूल्य हमारी आंतरिक पवित्रता का बाहरी रूप हैं. इसी तरह क़ुरआन और सुन्नत (अल्लाह के संदेष्टा की परंपरा) के साथ हमारा रिश्ता, अल्लाह और धर्म के साथ हमारे रिश्ते और हमारी इच्छायें, मक़सद और िंजदगी के मायने को परिभाषित करता है.

मैंने कामयाबी को लेकर अपने विचार, अपनी िंजंदगी के मायने और मक़सद के गहरे स्रोतों को लेकर सावधानीपूर्वक सवाल किया. वो बुनियादी रा़ज (सोर्स कोड) जिसने मेरी धारणाओं को प्रभावित किया, वो अलग आयामों में विकसित हुआ.

कामयाबी का हमारे पक्षपाती, भ्रमित, पारंपरिक और खोखले जीवन मूल्यों से सह-संबंध नहीं है. हमें क्यों बनाया गया इसके मक़सद को समझ लेना ही कामयाबी है. हम अपनी आत्मा को धोखा देकर गुमराही में आगे बढ़ते रहते हैं और ये भूल जाते हैं कि हमें क्यों बनाया गया है.

‘’और ताकि जो लोग परलोक को नहीं मानते, उनके दिल उसकी ओर झुकें और ताकि वे उसे पसन्द कर लें, और ताकि जो कमाई उन्हें करनी है कर ले।’’
– ़कुरआन (६:११)
हमरा मकसद, हमारी सच्चाई या डर ये हमारी खुदग़र्जी से निाqश्चत तय नही किये जा सकते । ये दुनियावी (लौकिक) मानकों पर तय नही किये जा सकते। अल्लाह कहेता है –

‘’गवाह है गुज़रता समय,
कि वास्तव में मनुष्य घाटे में है,
सिवाय उन लोगों के जो ईमान लाए और अच्छे कर्म किए और एक-दूसरे को हक़ की ताकीद की, और एक-दूसरे को धैर्य की ताकीद की।’’
– कुरआन (१०३)

ये यात्रा थकाऊ रही है, लंबे समय से मैं अपनी रूह से लड़ती रही हूं. ज्ािंंदगी बहुत छोटी है लेकिन अपने आप से लड़ते रहने के लिए बहुत लंबी भी है. इसलिए आज मैं अपने इस सोंचे समझे फ़ैसले पर पहुंची हूं और मैं अधिकारिक तौर पर इस क्षेत्र से अलग होने की घोषणा करती हूं।

यात्रा की कामयाबी आपके पहले क़दम पर निर्भर है. मेरे सार्वजनिक तौर पर ऐसा करने का कारण अपनी पवित्र छवि बनाना नहीं है बल्कि मैं एक नई शुरुआत करना चाहती हूं और उसके लिए कम से कम मैं इतना तो कर सकती हूं. क्योंकी मै उस म़काम पर आ चुकी है जहां रास्ता साफ तौर पर दिखाई दे रहा है, जीस पर मै खुद चलना चाहती थी और इसी दौरान मैने कुछ लो़गों के दिल में इस संबंध में (इस रास्ते पर चलने के लिये) कुछ लो़गों के दिल में बीज बो दिया है। लेकीन मेरा हर एक को एक प्रामाणिक मशवरा है की, कोई भी कामयाबी, शोहरत, ता़कत या दौलत की किमत आपके दिली सु़वूâन या इमान की रोशनी से ़ज्यादा नही हो सकती। अपनी इच्छाओं के सामने समर्पण मत करो क्योंकि इच्छाएं अनंत हैं. आपने जो कुछ हासिल किया है, हमेशा उससे बाहर निकलो. अपने आपको धोका मत दो या अपनी भत्र्सना मत करो और अपने स्वार्थ या अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिये धर्म के तत्त्वों का जानते बुझते अपनी सहुलत से अर्थ मत निकालों। कभी कभी हम अपने इमान में बहोत कम़जोर होते है और उसे हम हमेशा अलफा़ज और फलसफों में ढांक कर रखते है। हम जो कहेते है, वो हमारे दिल में नही होता, जबकी वो सभी विसंगतीयों का ज्ञान रखता है। उसे सब मालूम है, जो हम कहेते नही है, वोभी वो जानता है, क्याोंकी वो ‘अस् – समी (सब सुननेवाला), ‘‘अल-बसीर (सब कुछ देखनेवाला) और अल – अलीम (सबकुछ जाननेवाला) है।
‘‘और अल्लाह जानता है जो कुछ तूम छिपाते हो और दिखाते हो।’’ – ़कुरआन (१६:१९)
अपने मन में अपने मन से कुछ भ्रामक कल्पनायें पालने से बेहतर है की, खुद पुरी इमानदारीसे दिल में इमान रख कर सत्त्य की खोज करनी की कोशिश करो।
’’अय इमानवालों, अगर तुम ईशपरायणता (त़कवा) धारण करोगे तो, वो तुम्हें हराम और हलाल का फर्वâ करनें की सद्बुद्धी देगा।’’
– ़कुरआन (८:२९)
अल्लाह को नारा़ज करनेवाले और मर्यांदाओं का भंग करनेवालों को अपना आदर्श मत बनाओं। ऐसे लो़गों को अपनी पसंद नापसंद पर हावी मत होने दो या आपकी मं़िजल या इरादें उन्हें तय मत करने दो।
अल्लाह के संदेष्टा ने कहा, ‘‘व्यक्ती को (कयामत के दिन फिर से ़िजंदा किया जायेगा) उन्ही लो़गो के साथ, जिनसे वो मुहब्बत करता था।’’
अच्छा मशवरा देनेवाले ज्ञानी लो़गों के साथ दुव्र्यवहार मत करो और अल्लाह के मार्गदर्शन पर भरोसा रखो, बेशक वो दिलों को पेâरनेवाला है। जिसको वो मार्ग दिखायें, कोई उसे भटका नही सकता। हर को इस बात का एहसास नही रहेता की, क्या जानना चाहिये और क्या परिवर्तन करना चाहिये। इसलिये ऐसे लो़गो के विषय में किसी निर्णय तक पहोंच जाना, या उनका म़जाक उडाना, गाली देना, ये हमारा काम नही। हमारी ़िजम्मेदारी ये है की, हम एकदुसरे के संबंध में समझदारीसे सकारात्मक भाव पैदा करें।
‘‘(लोगो को) खबरदार किया करो की, खबरदार करना इमानवालों के लिये बेहतर है।’’ – ़कुरआन (५१:५५)
और हमने ऐसा करना चाहिये, तथ्यों को एक दुसरे के गले के निचे उतार कर नही, गाली देकर या दुव्र्यवहार से नही, या हिंसासेभी नही बाqल्क ये प्यार और मुहब्बत, दया से अपने अतराफ के लो़गो को प्रभावित करना है। (‘अगर आप देखें की, आपमें से कोई सो गया है, तो उसको जगाओ, उसके लिये दुवा करो और उसकी मदत करो और उसका अपमान करके या म़जाक उडाकर शैतान की मदत मत करो – आदरणीय उमर इब्न खत्ताब)
लेकीन ये करने से पहेले हमने याद रखना चाहिये की, हमने इस्लाम और उसको सोंच समझकर उसका ज्ञान अपने दिल में, अपने व्यवहार में, अपनी नियत में एक आदर्श के रूप में रखें। फिर उसका फायदा, धर्म के बुनियादी उसुलों की समझ का और व्यवहार का भी फायदा दुसरों को करवायें। एक बात याद रखो की, जब आप अपना सफर शुरू करोगे या उसके आदेशों पर चलने के लिये एक ़जमीन तैयार करोगे, तब आपको कई मुाqश्कलों का सामना करना पडेगा, कई रूकावटें, उपहास (म़जाक) और परेशानीयों का सामना करना पडेगा दुसरे लो़गों से या कभी कभी तो उन लो़गों से भी जीनको आप बहोत प्यार करते हो और वो आपके बहोत करीबी है। इसका कारण आपका पिछला बर्ताव या अबतक की आपकी पुरी ़िजंदगी हो सकता है। लेकीन आप मायुस मत होईये, हौसले पस्त मत किजीये। अल्लाह की रहेमत (कृपा) और मार्गदर्शन (हिदायत) से उम्मीद रखीये। वो हादी है। आपके पिछले आमाल (कर्म) की वजेह से आप अपने आपको तौबा करने से रोके नही। याद रखो, वो ‘गफ्फार’ (बार बार माफ करनेवाला) है।
‘‘दरह़िककत, अल्लाह उनसे मुहब्बत करता है, जो तौबा करके उसकी तरफ पलटता है और उसने मुहब्बत करता है जो खुद अपनी आत्मशुद्धी (त़जकीया) करते है।’’
– ़कुरआन (२:२२२)
आपके बारे में लो़गों की राय, ताने, गालीयाँ, अलफा़ज या लो़गो का डर आपको अपने रास्ते से दूर ना ले जायें या अपने आपको बयान करने से रोक नही पायें। याद रखों, वो अल – वली (मदत करनेवाला) है। आपके ़िजंदगी के कल की फिक्र आपको उसके रास्ते से हटायें नही, जो रा़जीक (रि़ज्क यानी रो़जीरोटी देनेवाला) है।
ये काफी मुाqश्कल हो सकता है, पेचिदा और कभी कभी तन्हाईवाला रास्ताभी हो सकता है, खुसुसन आज के दौर में, लेकीन याद रखों, अल्लाह के संदेष्टा (सलअम् ) ने फर्माया है, ‘‘लोगो पर एक वक्त ऐसा भी आनेवाला है, जब धर्म पर चलने का मतलब आग के शोले का थामना होगा।’’
अल्लाह हमारी कश्ती को किनारे लगाने के लिये हमारा मार्गदर्शन करे और सत्त्य – असत्त्य के बीच फर्वâ करने में हमारी मदत करे। अल्लाह हमारा इमान म़जबूत करे और उसकी याद करनेवालों में हमारा शुमार करे और हमारे दिलों को म़जबूत और अटल रखें। अल्लाह हमें उसके इल्म की बेहतरीन समझ अता फरमा और हमारे शक ओ शुबहात और नीजी तौर पर हमसे होनेवाली गलतीयों को दूर करने की हमारी कोशिशों को कुबूल फरमायें। अल्लाह हमारे दिलों को लालच, ब़गावत, अज्ञान से हमको दूर रखे और हमारी नियतों को दुरूस्त करे और हमें वचन और व्यवहार में इमानदारी (प्रामाणिकता) प्रदान करें (अता करे), आमीन!

: ज़ाएरा वसीम

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here